Aditi Singh will be the face against Sonia in 22 as well as 24, like Amethi will surround Congress with women here too | 22 के साथ-साथ 24 में सोनिया के खिलाफ अदिति सिंह होंगी चेहरा, अमेठी की तरह यहां भी महिला से कांग्रेस को घेरेगी

रायबरेली31 मिनट पहले

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रायबरेली में BJP का ‘लोकल फॉर वोकल’ का सपना पूरा।

बरसों पुराना ‘लोकल फॉर वोकल’ का रायबरेली में संजोया गया भाजपा का सपना अदिति सिंह के रूप में पूरा होने जा रहा है। शुक्रवार को जिस तरह सीएम योगी के कार्यक्रम में सदर विधायक दिखीं वो संकेत था कि 2019 में दिनेश सिंह भाजपा से होकर गांधी परिवार के जिस तिलिस्म को नहीं तोड़ सके, उसे अदिति आने वाले लोकसभा में भेद सकती हैं। इस हिसाब से अदिति 2022 के साथ-साथ रायबरेली से 2024 का भी भाजपा से चेहरा होंगी।

2019 में दिनेश सिंह ने अपनी ताकत का दिखाई थी

मौजूदा समय में 24 नवंबर को अदिति सिंह द्वारा भाजपा ज्वाइन करने के बाद यहां बड़े-बड़े मठाधीशों की बत्ती गुल हो गई। काफी हद तक भीतरघात पर विराम लगा। हां अक्टूबर 2018 में तत्कलीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और सीएम योगी को रायबरेली में बुलाकर विशाल कार्यक्रम आयोजित कर पार्टी को हाईजैक करने वाले MLC दिनेश सिंह की इंट्री से पार्टी में खींचातानी बढ़ गई थी। साल 2019 के चुनाव में यह विरोध दिखा भी था, जब 2014 के पार्टी प्रत्याशी अजय अग्रवाल ने मोर्चा खोल दिया था। हालांकि बीजेपी गांधी परिवार के जिस नींव को कमजोर करने के लिए पंचवटी परिवार से दिनेश सिंह को लेकर आई वो हो नहीं सका। सोनिया गांधी ने यूपी में रायबरेली की इकलौती लोकसभा सीट डेढ़ लाख से अधिक मतों से जीत ली थी।

पिता अखिलेश सिंह के साथ विधायक अदिति सिंह।

पिता अखिलेश सिंह के साथ विधायक अदिति सिंह।

इतिहास में देखने पर पता चलता है कि रायबरेली को गांधी परिवार का हिस्सा बना देने का काम सबसे पहले इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी ने किया। बाद में इंदिरा और सोनिया गांधी भी यहां से सांसद बनीं। कांग्रेस यहां इस कदर मजबूत हुई कि 1957 से 2019 तक मात्र 3 बार लोकसभा चुनावों में उसे हार का सामना करना पड़ा है। सबसे चर्चित चुनाव 1977 का रहा, जब भारतीय लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़े समाजवादी धड़े के नेता राज नारायण ने इंदिरा गांधी को हरा दिया था। इसके अलावा राम मंदिर लहर में 1996 और 1998 में बीजेपी से अशोक सिंह जीते थे, लेकिन तब गांधी परिवार का यहां से कोई नुमाइंदा नहीं था। बीजेपी के इस जीत के रथ को 1999 में कैप्टन शर्मा ने रोका था।

2004 तक यहां सपा आदि भी कैंडिडेट उतारती रही, लेकिन 2009 से सपा गांधी परिवार के सम्मान में अमेठी और रायबरेली में और कांग्रेस मुलायम परिवार के सम्मान में प्रत्याशी उतारने से बचने लगी। 2009 में तो बीएसपी के आर.एस.कुशवाहा यहां से उपविजेता थे और 2004 में सपा के अशोक कुमार सिंह। इस सीट पर पासी जाति का प्रभाव माना जाता है। इसके अलावा ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रिय जातियों के लोकल नेता निकाय चुनाव, विधानसभा से लेकर लोकसभा चुनाव तक प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। हालांकि, सोनिया गांधी और गांधी परिवार के नाम पर जातीय समीकरण खास फर्क नहीं डाल पाते हैं।

सीएम योगी के साथ मंच पर विधायक अदिति सिंह।

सीएम योगी के साथ मंच पर विधायक अदिति सिंह।

सशक्त महिला की तलाश में थी बीजेपी

इसीलिए बीजेपी यहां सोनिया के मुकाबले पर लोकल वो भी सशक्त महिला तलाश रही थी। यह मनोकामना उसकी अदिति सिंह के रूप में पूरी हुई। मई 2019 में जब अदिति के काफिले पर हमला हुआ और गांधी परिवार ने बेरुखी दिखाई तो यहीं से अदिति और गांधी परिवार के बरसों पुराने रिश्ते में गांठ पड़ी। इस समय सीएम योगी ने अखिलेश सिंह की बेटी होने के नाते उनका समर्थन किया। यही वजह रही जहां अदिति पार्टी गाइडलाइन से हटकर बोलने लगीं तो वहीं सीएम की भी कई बार उन्होंने प्रशंसा की। यह बातें खाई का कम करती गईं। राहुल-प्रियंका ने भी इसे पाटने का काम नहीं किया और कांग्रेस के मैनेजरों ने आग में घी डालने का काम किया।

नतीजा यह हुआ कि अदिति के रूप में रायबरेली का एक मजबूत स्तंभ कांग्रेस को कमजोर कर बीजेपी को यहां खड़ा कर गया। अब यहां कांग्रेस नेता विहीन हो गई। उधर, भाजपा के लिए अदिति के आने से फायदा यह हुआ कि महिला होकर जहां वो मजबूती से गांधी परिवार को सीधी टक्कर दे सकती हैं तो वहीं राजनीति के हर मुद्दों पर बेबाकी से बात कर सकती हैं। प्रदेश लेबल पर उनका कद दिनेश सिंह भी बड़ा है।

2017 में अखिलेश सिंह ने अदिति सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।

2017 में अखिलेश सिंह ने अदिति सिंह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।

2017 में बेटी को उत्तराधिकारी घोषित किया

खुद अगर उनकी सियासत की बात की जाए तो सदर सीट जहां से वो विधायक हैं, वहां 1989 से ही उनके पिता अखिलेश सिंह की बादशाहत कायम थी। 2017 में उन्होंने अपनी बेटी अदिति सिंह को रायबरेली विधानसभा से विधायक बनाकर अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। हालांकि कुछ दिनों पहले अखिलेश सिंह का निधन हो गया। अदिति सिंह कांग्रेस के टिकट पर लड़ी थीं और बसपा के मो. शाबाज खान को 89,163 वोट को बड़े अंतर से हराया।

रायबरेली विधानसभा सीट पर 1967 से कांग्रेस का कब्जा रहा है। इस सीट पर आज तक 10 बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है। 1967 में पहली बार कांग्रेस के मदन मोहन मिश्रा विधायक बने। 1969 में मदन मोहन मिश्रा दोबारा विधायक बने। वहीं इसके बाद 1974 में सुनीता चौहान, 1977 में मोहन लाल त्रिपाठी, 1980 और 1985 में रमेश चंद्र कांग्रेस से विधायक बने। वहीं 1989 में कांग्रेस का विजय रथ थमा और 1991 तक लगातार दो बार अशोक सिंह विधायक बने।

प्रियंका गांधी के साथ अदिति सिंह।

प्रियंका गांधी के साथ अदिति सिंह।

1993 में अखिलेश सिंह बने विधायक

इसके बाद रायबरेली की राजनीति में अखिलेश सिंह की एंट्री हुई, जिसके बाद उनका नाम ही जीत की गारंटी बन गया। 1993 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर अखिलेश सिंह विधायक बने। 1996 और 2002 में भी विधायक बनकर उन्होंने जीत की हैट्रिक लगाई। इतना ही नहीं 2007 में निर्दलीय विधायक बनकर अखिलेश सिंह ने अपनी ताकत दिखाई। इसके बाद पीस पार्टी के टिकट पर वह लगातार पांचवी बार विधायक बने।

रायबरेली विधानसभा सीट पर मुस्लिम वोटरों की संख्या अधिक

वरिष्ठ पत्रकार रजनीश पांडेय बताते हैं कि अखिलेश सिंह रायबरेली के कद्दावर नेताओ में एक थे। जनता जिस तरह उनका सम्मान करती थी, वही सम्मान वो उनकी बेटी अदिति सिंह को भी देती है। उन्होंने बताया कि रायबरेली विधानसभा सीट पर मुस्लिम वोटरों की संख्या अधिक है, जो अखिलेश सिंह का बेस वोट बैंक था। आज जब अदिति सिंह भाजपा में आ गईं तो उनके चेहरे पर यह वोट बैंक उन्हें वोट करेगा।

पिता अखिलेश सिंह की तरह अदिति सिंह का भी रायबरेली विधानसभा सीट पर दबदबा है।

पिता अखिलेश सिंह की तरह अदिति सिंह का भी रायबरेली विधानसभा सीट पर दबदबा है।

उन्होंने यह भी बताया कि कोरोना काल में वो अपने क्षेत्र में डटी रहीं। खासकर दूसरी लहर में वो ऑक्सीजन से लेकर हर मूलभूत सुविधाओं के लिए अपनी जनता में बनी रहीं। वो कहते हैं कि बीजेपी अमेठी की तरह ही रायबरेली में महिला प्रत्याशी तलाश रही थी, जो अदिति सिंह के रूप में पूरी हुई है। अदिति के स्थानीय, महिला और प्रभावशाली होने का लाभ बीजेपी को मिलेगा।

गरीबों के मसीहा थे अखिलेश सिंह

वहीं वरिष्ठ पत्रकार नरेंद्र सिंह बताते हैं कि अखिलेश सिंह पर भले ही बाहुबली का ठप्पा लगा रहा, लेकिन उन्होंने कभी किसी को परेशान नहीं किया। उनकी स्थिति तो यह थी कि गरीब का आशियाना जल गया तो बंद मुट्ठी 50 हजार की तत्काल मदद, गरीब की बेटी के हाथ पीले होने हैं तो एक लाख का सामान घर पर पहुंच गया। कमोबेश यही हालत अदिति सिंह की है। हां अखिलेश सिंह बाहरी दबंगों और ठेकेदारों के लिए जो रायबरेली में आकर दबंगई दिखाते थे, उनको टिकने नहीं देते थे। अब यही काम अदिति सिंह कर रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि हां यह अलग बात है कि सोनिया गांधी सांसद होते यहां आई कम हैं, लेकिन एम्स जैसी मूलभूत सुविधाएं उनकी ही वजह से संभव हो सकी है।

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